व्यथित है मन

न जाने क्यों चिंतित और व्यथित है मन,

ज्यों विरह की पीड़ा में डूबी हो विरहन

मंदिरों के बंद हैं कपाट कष्टदाई जीवन रहे काट,

हवा से भंवरों की गुंजन नदारद,कोकिल का स्वर लुप्त हुआ,

दीवारें रिश्तों में पहले क्या कम थीं,महामारी में आत्मभाव विलुप्त हुआ
दिल की पालकी में ख्वाहिशें पर्दानशी हो रही,

सासों की डोरी निरंतर जर्जर और क्षीण हो रही
और कितने घरों को विरान होना बाकी है,

क्या जो हो रहा,वो प्रलय की झांकी है,

पर्यावरण को दूषित किया था जिस हलाहल ने,

वो कदाचित मानुष ने ही हवा में घोला है,

स्वार्थी लोगों के कुकृत्य को झेलता,जो भोला है,

गंगा को और न जाने कितने पाप धोने होंगे
आने वाले युग में हम खुद कर्मों से बौने होंगे,

पाप के घड़े कितने भरते रहोगे,अब तो सभलो,

विनाश के लावा का सृजन रोको,नेकी कर चलो।

देदीप्यमान हो आपकी नूतन वर्ष की डगर,
ध्वस्त हो जाय आपदा-अनिष्ट का डर,
कदम कदम पर सफलता से साक्षात्कार हो
पूरी हो हर इच्छा सपने सभी साकार हों
परिजनों में सम्मान तथा गुरुजनों सा ज्ञान हो
निरोगी काया के स्वामी मुख पर मुस्कान हो
परिवार की बगिया में उन्नति के प्रसून खिलें
आगामी वर्षों में भी आमोद निर्विघ्न मिलें
ऐसी कामना सदा आपके लिए हम करते हैं,
नए वर्ष का प्रारंभ नई उमंगों से करते हैं।

  • स्वीटी गुप्ता

जय श्री राम ………..
जग महि ज्ञान कुशल बहुतेरे, जानहिं जनम मरण के फेरे
अति के ज्ञानी काग समाना, बिन बूझे करि ज्ञान बखाना
वेद पुराण ज्ञान कछु नाहीं, रटहु राम केवल मन माहीं
जासु नाम जीवन आधारा, सो करिहै भव सागर पारा।

स्वयं पर गर्व कीजिए …………………………………….

प्रचण्ड वेग ये राष्ट्रवाद का रुकने को तैयार नहीं
और नींद से जागा हिन्दू झुकने को तैयार नहीं

विषदंतों को तोड़ रहे हैं,धर्म से नाता जोड़ रहे हैं
जाग रहे हैं धीरे धीरे, जात पात को छोड़ रहे हैं
यशगाथाएं जान रहे हैं, सर्वश्रेष्ठ हम मान रहे हैं
मानव उत्पत्ति से पहले अपने वेद पुराण रहे हैं
अपनी परम्परा का गौरव तजने को तैयार नहीं
और नींद से जागा हिन्दू झुकने को तैयार नहीं।